लाल किले से पीएम मोदी का बड़ा संदेश: ‘हथियार वाले नक्सल खत्म, अब दिमागी नक्सलवाद से सावधान रहने की जरूरत’

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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत ने हथियार उठाकर हिंसा करने वाले नक्सलवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है और अब यह खतरा काफी कमजोर हो चुका है। हालांकि, प्रधानमंत्री ने चेताया कि विचारधारा के स्तर पर नक्सलवाद को बढ़ावा देने वाली ताकतों से अभी भी सतर्क रहने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ऐसे लोगों के लिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि इन तत्वों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। उनके मुताबिक, जंगलों में बंदूक के जरिए हिंसा करने वाला नक्सलवाद कमजोर पड़ा है, लेकिन उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिशें अब भी चुनौती बनी हुई हैं।

मोदी ने इस दौरान नक्सल विरोधी अभियान में शहीद हुए सुरक्षा बलों के जवानों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए हजारों जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की सुरक्षा और विकास से जुड़ी रणनीति को भी रेखांकित किया।

प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में सशस्त्र नक्सली गतिविधियों का प्रभाव पिछले वर्षों की तुलना में काफी घटा है। हालांकि, ‘दिमागी नक्सल’ की उनकी टिप्पणी ने राजनीतिक बहस को भी जन्म दे दिया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस बयान पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया।

पीएम मोदी के बयान का क्या मतलब?

प्रधानमंत्री के भाषण का मुख्य संदेश यह रहा कि सिर्फ हथियारबंद हिंसा को खत्म करना पर्याप्त नहीं है। सरकार का मानना है कि हिंसक विचारधारा को सामाजिक और वैचारिक स्तर पर फैलने से रोकना भी जरूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने लोगों से ऐसे तत्वों को पहचानने और उनसे सावधान रहने की अपील की।

स्वतंत्रता दिवस के भाषण में नक्सलवाद का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री ने यह संकेत भी दिया कि सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार अब केवल जंगलों में चलने वाले सशस्त्र अभियान तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वैचारिक प्रभाव को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देख रही है।

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