चीनी 50 से बढ़कर 80 रुपये किलो, आखिर मुनाफा जा कहां रहा है?

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

त्योहारी सीजन से ठीक पहले चीनी की कीमतों में आई तेज उछाल ने आम उपभोक्ताओं से लेकर गन्ना किसानों और नीति-निर्माताओं तक, सबकी नींद उड़ा दी है। सवाल सिर्फ महंगाई का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि आखिर इस बढ़ोतरी का असली फायदा किसे मिल रहा है।

एक महीने में कितनी बढ़ी कीमत

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। लेकिन बाजार की हकीकत इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है — कई इलाकों में उपभोक्ताओं को पहले जहां करीब 50 रुपये किलो चीनी मिलती थी, वहीं अब 70 से 80 रुपये किलो तक चुकाने पड़ रहे हैं।

किसान नेता का घोटाले का आरोप

किसान नेता राजू शेट्टी ने इस पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनके अनुसार जून तक चीनी का भाव 3,500-3,600 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर था। शेट्टी का आरोप है कि बड़े उत्पादकों ने अपनी ट्रेडिंग कंपनियों को सस्ते दाम पर चीनी बेची, फिर उसे स्टॉक कर लिया गया और बाद में टेंडर रेट करीब 6,500 रुपये तक पहुंचा दिए गए, जिससे कारोबारियों को भारी मुनाफा हुआ। उनके मुताबिक यह पूरा खेल 22,000-23,000 करोड़ रुपये तक का हो सकता है।

सरकार की सफाई: इथेनॉल नहीं है असली वजह

केंद्र सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी की वजह इथेनॉल उत्पादन बताए जाने के दावों को खारिज किया है। सरकार के अनुसार इथेनॉल के लिए भेजी जाने वाली चीनी 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गई है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसके पीछे रेड रॉट बीमारी और अल नीनो के असर को जिम्मेदार बताया, जिसने भारत ही नहीं पूरी दुनिया में गन्ने की फसल को प्रभावित किया।

उत्पादन अनुमान में भी कटौती

शुरुआत में चीनी उत्पादन करीब 343 लाख टन रहने का अनुमान था, जिसे अब घटाकर 306 लाख टन कर दिया गया है। महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त संजय कोल्टे ने भी माना कि मौसम की वजह से उत्पादन में कमी आई है।

किसानों का विरोध प्रदर्शन

पुणे में गन्ना किसानों के परिवारों ने चीनी आयुक्त कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर मांग की कि बढ़ी कीमतों का फायदा किसानों तक भी पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने उचित भुगतान, बिजली बिल माफी और तौल में गड़बड़ी खत्म करने की मांग उठाई।

सरकार के कदम

जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने कारोबारियों पर 400 टन की स्टॉक लिमिट लागू की है, जो 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगी। इसके अलावा 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी गई है, और मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है।

बड़ा सवाल अब भी बरकरार

असली वजह कम उत्पादन है या बिचौलियों की मुनाफाखोरी — यह सवाल अब भी अनसुलझा है। उपभोक्ताओं की चिंता फिलहाल जेब पर पड़ने वाला बोझ है, जबकि किसानों को इंतजार है कि बढ़े दामों का हिस्सा आखिर उन तक भी पहुंचेगा या नहीं।

और पढ़ें

[the_ad id="164"]