बनभूलपुरा रेलवे जमीन विवाद: 3500 घरों पर बुलडोजर का बड़ा खतरा, आज सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

बनभूलपुरा रेलवे जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट फैसले से पहले सुरक्षा व्यवस्था

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उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर से सटे बनभूलपुरा इलाके में बरसों से चल रहा बनभूलपुरा रेलवे जमीन विवाद आज एक बड़े मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट आज इस मामले पर अहम फैसला सुनाने वाला है, जिसकी वजह से पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। ड्रोन कैमरों से निगरानी, फ्लैग मार्च और भारी सुरक्षा बल की तैनाती से साफ झलकता है कि प्रशासन किसी भी स्थिति के लिए तैयार बैठा है।

आखिर विवाद की जड़ क्या है?

ये पूरा मामला रेलवे की करीब 30 हेक्टेयर (78 एकड़) जमीन से जुड़ा है, जिस पर पिछले कई दशकों से बस्ती बसी हुई है। इस मुस्लिम-बहुल इलाके में 3500 से अधिक घर, मस्जिदें और मदरसे बने हैं, और यहां करीब 50 हजार लोग रहते हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब गौला नदी में अवैध खनन से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के आदेश दे दिए। इसके बाद रेलवे ने जमीन पर मालिकाना हक जताते हुए स्थानीय निवासियों को जगह खाली करने का नोटिस थमा दिया।

रेलवे बनाम स्थानीय निवासी: किसका क्या दावा है

रेलवे प्रशासन के पास 1959 के नोटिफिकेशन, 1971 के रेवेन्यू रिकॉर्ड और 2017 की सर्वे रिपोर्ट जैसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिनके आधार पर वो पूरी 78 एकड़ जमीन को अपनी संपत्ति बताता है। वहीं स्थानीय लोगों का तर्क अलग है — उनका कहना है कि शुरुआत में हाईकोर्ट में केवल 29 एकड़ जमीन को लेकर विवाद था, लेकिन बाद में रेलवे ने दायरा बढ़ाकर पूरी 78 एकड़ जमीन पर दावा ठोक दिया। सौ साल से ज्यादा समय से यहां रह रहे परिवारों का कहना है कि ये असल में राज्य सरकार की नजूल जमीन है, और सरकार को इसे फ्री-होल्ड कर उनकी रिहाइश वैध करनी चाहिए।

नजूल जमीन आखिर होती क्या है?

नजूल जमीन दरअसल वो सरकारी भूमि है जिस पर बिना सरकारी अनुमति के न तो पक्का निर्माण हो सकता है, न ही खेती। ऐसी जमीन को आम आदमी सीधे खरीद या बेच नहीं सकता। अंग्रेजों के जमाने में जिन क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की संपत्ति जब्त कर ली गई थी, वो आजादी के बाद वारिस न मिलने या सही कागजात न होने की वजह से सरकार के अधिकार में आ गई। राज्य सरकारें ऐसी जमीनों को 15 से 99 साल की लीज पर देती हैं, जिसे बाद में रिन्यू भी कराया जा सकता है। नजूल लैंड्स (ट्रांसफर) रूल्स 1956 के तहत इनका इस्तेमाल स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन या हाउसिंग सोसायटी जैसे कामों के लिए किया जाता है।

8 फरवरी 2024 की हिंसा, जिसने पूरे देश को झकझोरा

बनभूलपुरा विवाद सिर्फ अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। 8 फरवरी 2024 को जब नगर निगम और प्रशासन की टीम अतिक्रमण हटाने पहुंची, तो वहां भारी पथराव, आगजनी और हिंसा भड़क उठी थी। इस उपद्रव में सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। जांच के बाद नगर निगम ने मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को 2.45 करोड़ रुपये की भरपाई का रिकवरी नोटिस थमाया था। हिंसा के डर से इलाके से 500 से ज्यादा मुस्लिम परिवारों ने पलायन तक कर लिया था।

24 फरवरी 2026 का SC आदेश और राहत पैकेज

इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि विवादित जमीन रेलवे की ही है और वो इसका इस्तेमाल अपनी मर्जी से कर सकता है। स्थानीय निवासी वहां बसे रहने का दावा नहीं कर सकते। हालांकि कोर्ट ने राहत भी दी — प्रभावित परिवारों को हटाए जाने की स्थिति में छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये की आर्थिक मदद देने और बनभूलपुरा में ही पुनर्वास केंद्र बनाने का निर्देश दिया गया था।

आज का फैसला क्यों अहम है

आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पूरे देश की निगाहें हैं, क्योंकि एक तरफ रेलवे की विस्तार योजनाएं जुड़ी हैं, तो दूसरी तरफ हजारों परिवारों के सिर से छत छिनने या बचने का सवाल है। इसी वजह से एसपी क्राइम और एसपी सिटी की अगुवाई में संयुक्त पुलिस टीमों ने संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च किया, और ड्रोन-सीसीटीवी से पूरे इलाके पर नजर रखी जा रही है।

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