कुशीनगर। पुलिस लाइन में जन्माष्टमी की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। परिसर को सजाया जा रहा था। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों में उत्साह का माहौल था। जिले में नवगठित पुलिस व्यवस्था के बीच पहली बार जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाने की तैयारियां थीं।लेकिन 29 अगस्त 1994 की वही रात कुशीनगर पुलिस के इतिहास की सबसे दर्दनाक रात बन गई।
जन्माष्टमी की तैयारियों के बीच पचरुखिया से आई मुठभेड़ की खबर ने पुलिस लाइन के उत्सव के माहौल को अचानक मातम में बदल दिया। बांसी नदी के किनारे जंगल पार्टी के कुख्यात डकैतों से हुई भीषण मुठभेड़ में छह पुलिसकर्मी और एक स्थानीय नाविक शहीद हो गए। ड्यूटी पर निकले पुलिसकर्मियों के शहीद होने की खबर जैसे-जैसे पुलिस लाइन पहुंची, वैसे-वैसे जन्माष्टमी की तैयारियां थमती चली गईं। सजावट और उत्सव की जगह पुलिसकर्मियों के चेहरों पर चिंता और शोक ने ले ली।
पचरुखिया की इस घटना की टीस इतनी गहरी थी कि इसके बाद कुशीनगर पुलिस ने जन्माष्टमी को उत्सव के रूप में मनाना बंद कर दिया। यह दिन पुलिस महकमे के लिए ब्लैक डे बन गया। करीब तीन दशक तक थानों और पुलिस लाइन में जन्माष्टमी का आयोजन नहीं हुआ। 31 साल बाद पिछले वर्ष इस परंपरा को बदला गया और अब 32 साल बाद कुशीनगर पुलिस दूसरी बार थानों और पुलिस लाइन में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएगी।
कुशीनगर के लिए 1994 था ऐतिहासिक साल
वर्ष 1994 कुशीनगर के इतिहास में कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आज का कुशीनगर उस समय तक देवरिया जिले का हिस्सा था। 13 मई 1994 को कुशीनगर को देवरिया से अलग कर उत्तर प्रदेश के नए जिले के रूप में अस्तित्व में लाया गया। नवसृजित जिले का प्रशासनिक मुख्यालय पडरौना बनाया गया। जिला बनने के पीछे क्षेत्र के संतुलित और तेजी से विकास को प्रमुख उद्देश्य बताया गया था। इसके साथ ही इलाके की प्रशासनिक व्यवस्था को अलग पहचान मिली और पुलिस-प्रशासन का नया ढांचा खड़ा किया गया।
जन्माष्टमी के पहले उत्सव की तैयारियों में डूबा था पुलिस लाइन
वर्ष 1994 में कुशीनगर तत्कालीन पडरौना जिले के रूप में नया-नया अस्तित्व में आया था। जिले में पहली बार जन्माष्टमी का पर्व मनाने को लेकर पुलिस महकमे में भी उत्साह था। पुलिस लाइन में आयोजन को लेकर तैयारियां चल रही थीं।पुलिसकर्मी अपने स्तर से व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने में जुटे थे।
पुलिस लाइन में जन्माष्टमी को लेकर सजावट, पूजा और अन्य कार्यक्रमों की तैयारियां चल रही थी,पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों में पर्व को लेकर उत्साह था। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों बाद यही उत्सव पुलिस विभाग के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटना की याद से जुड़ जाएगा। 29 अगस्त 1994 की रात जन्माष्टमी की तैयारियों के बीच पडरौना कोतवाली पुलिस को सूचना मिली कि जंगल पार्टी के कुख्यात डकैत बेचू मास्टर और रामप्यारे कुशवाहा उर्फ सिपाही पचरुखिया गांव के ग्राम प्रधान राधाकृष्ण गुप्त के घर डकैती डालने और उनकी हत्या की योजना बना रहे हैं। उस दौर में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में जंगल पार्टी के डकैतों का खौफ था। सूचना को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन पडरौना कोतवाल योगेंद्र प्रताप सिंह ने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक बुद्धचंद को जानकारी दी।
एसपी के निर्देश पर बनाई गई थीं दो पुलिस टीमें
सूचना मिलते ही एसपी के निर्देश पर डकैतों की घेराबंदी के लिए दो पुलिस टीमें बनाई गईं। पहली टीम का नेतृत्व सीओ पडरौना आरपी सिंह ने किया। टीम में सीओ हाटा गंगानाथ त्रिपाठी, दारोगा योगेंद्र सिंह और आरक्षी मनिराम चौधरी, राम अचल चौधरी, सुरेंद्र कुशवाहा, विनोद सिंह तथा ब्रह्मदेव पांडेय शामिल थे। वहीं दूसरी टीम की कमान तरयासुजान के तत्कालीन थानाध्यक्ष अनिल पांडेय को दी गई। इस टीम में कुबेरस्थान के थानाध्यक्ष राजेंद्र यादव, दारोगा अंगद राय तथा आरक्षी लालजी यादव, खेदन सिंह, विश्वनाथ यादव, परशुराम गुप्त, श्यामा शंकर राय, अनिल सिंह और नागेंद्र पांडेय शामिल थे। पुलिस टीमों ने डकैतों की तलाश और घेराबंदी शुरू कर दी। जन्माष्टमी की तैयारियों में व्यस्त पुलिस लाइन से लेकर पूरे पुलिस महकमे में उस समय सामान्य माहौल था, लेकिन पचरुखिया की ओर बढ़ रही पुलिस टीमों के सामने एक बड़ा खतरा इंतजार कर रहा था।
रात साढ़े नौ बजे बांसी नदी के किनारे पहुंची पुलिस टीम
रात करीब साढ़े नौ बजे पुलिस की दूसरी टीम बांसी नदी के किनारे पहुंची। पुलिस को सूचना मिली थी कि डकैत नदी के दूसरी ओर पचरुखिया गांव की तरफ छिपे हुए हैं। नदी पार करने के लिए स्थानीय नाविक भूखल की मदद ली गई। पुलिसकर्मी डेंगी नाव के जरिए नदी पार करने लगे। अभियान बेहद जोखिम भरा था लेकिन डकैतों को पकड़ने और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस टीम आगे बढ़ती रही।पहली खेप में सीओ और कुछ पुलिसकर्मी नदी पार कर गए। इसके बाद दूसरी टीम नाव पर सवार होकर नदी पार करने लगी। इसी दौरान अंधेरे में छिपे डकैतों ने अचानक पुलिस टीम पर हमला बोल दिया।
जन्माष्टमी की रात बांसी नदी पर बरसीं गोलियां
अचानक हुए बम विस्फोट और ताबड़तोड़ फायरिंग से पूरा इलाका दहल उठा।पुलिसकर्मियों को संभलने का मौका तक नहीं मिला,बदमाशों की ओर से लगातार फायरिंग की जा रही थी। गोली लगने से नाविक भूखल और सिपाही विश्वनाथ यादव घायल हो गए। दोनों के घायल होने से नाव का संतुलन बिगड़ गया और डेंगी नदी में डूबने लगी। नदी में पूरा अंधेरा और बदमाशों की फायरिंग के बीच पुलिसकर्मियों के सामने जान बचाने की चुनौती खड़ी हो गई। इस भीषण मुठभेड़ में तत्कालीन थानाध्यक्ष अनिल पांडेय, थानाध्यक्ष राजेंद्र यादव, आरक्षी नागेंद्र पांडेय, खेदन सिंह, विश्वनाथ यादव और परशुराम गुप्त शहीद हो गए। पुलिस टीम की मदद करने वाला स्थानीय नाविक भूखल भी शहीद हो गया। जबकि दारोगा अंगद राय, लालजी यादव, श्यामा शंकर राय और अनिल सिंह किसी तरह सुरक्षित बच निकले।
पुलिस लाइन में उत्सव का माहौल कुछ ही देर में मातम में बदला
पचरुखिया में मुठभेड़ चल रही थी और इधर पुलिस लाइन में जन्माष्टमी की तैयारियां चल रही थीं। पुलिसकर्मी उत्सव की व्यवस्थाओं में जुटे थे।लेकिन जैसे ही मुठभेड़ और पुलिसकर्मियों के शहीद होने की खबर पुलिस लाइन पहुंची, वहां का पूरा माहौल बदल गया। जिस परिसर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारियां हो रही थीं, वहां अचानक शोक की लहर दौड़ गई। जन्माष्टमी की खुशियां फीकी पड़ गईं। पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के लिए वह रात हमेशा के लिए एक दर्दनाक स्मृति बन गई। पचरुखिया की घटना में शहीद हुए पुलिसकर्मी महज ड्यूटी पर तैनात जवान नहीं थे, बल्कि पुलिस विभाग के अपने साथी थे। उनके बलिदान ने पूरे पुलिस महकमे को झकझोर दिया।
हथियार बरामद हुए, लेकिन अनिल पांडेय की पिस्तौल आज तक नहीं मिली
मुठभेड़ के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मौके से हथियार और कारतूस बरामद किए। हालांकि तत्कालीन थानाध्यक्ष अनिल पांडेय की पिस्तौल आज तक बरामद नहीं हो सकी। यह बात भी पचरुखिया मुठभेड़ से जुड़ी उन यादों में शामिल है, जो घटना के वर्षों बाद भी पुलिस विभाग में चर्चा का विषय बनी रहीं। घटना की भयावहता और पुलिसकर्मियों की शहादत ने जन्माष्टमी को पुलिस महकमे के लिए उत्सव के बजाय शोक से जोड़ दिया।
तीन दशक तक जन्माष्टमी बनी रही ब्लैक डे
पचरुखिया की घटना के बाद कुशीनगर पुलिस ने जन्माष्टमी के पर्व को ब्लैक डे के रूप में याद करना शुरू कर दिया। थानों और पुलिस लाइन में जन्माष्टमी के कार्यक्रम बंद कर दिए गए। हर वर्ष जन्माष्टमी आती रही लेकिन पुलिस परिसर में उत्सव नहीं होता था। वरिष्ठ पुलिसकर्मी नई पीढ़ी के जवानों को पचरुखिया की उस रात की कहानी बताते रहे। इस तरह जन्माष्टमी और पचरुखिया की मुठभेड़ की स्मृति पुलिस विभाग की पीढ़ियों से जुड़ती चली गई।
31 साल बाद बदली परंपरा
करीब 31 साल बाद पिछले वर्ष इस परंपरा में बदलाव हुआ। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार मिश्रा ने जन्माष्टमी को ब्लैक डे के रूप में मनाने की परंपरा को समाप्त करने का निर्णय लिया। उनका तर्क था कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाने में कोई अपशकुन नहीं है। पचरुखिया में शहीद हुए पुलिसकर्मियों का बलिदान अपनी जगह अमर है और उन्हें हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा, लेकिन जन्माष्टमी को हमेशा शोक के दिन के रूप में मनाते रहना जरूरी नहीं है। उन्होंने शहादत की पीड़ा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने की पहल की। इसके बाद पिछले वर्ष 31 साल बाद पुलिस लाइन और जिले के थानों में जन्माष्टमी का आयोजन किया गया। लंबे अंतराल के बाद पुलिस परिसरों में फिर से सजावट हुई, पूजा-अर्चना हुई और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन हुआ। स्थानीय लोगों को भी कार्यक्रमों में आमंत्रित किया गया।
इस वर्ष 32 साल बाद दूसरी बार होगी जन्माष्टमी
पिछले वर्ष शुरू हुई यह नई परंपरा अब आगे बढ़ रही है। पचरुखिया मुठभेड़ के 32 साल बाद इस वर्ष कुशीनगर पुलिस दूसरी बार थानों और पुलिस लाइन में जन्माष्टमी का पर्व मनाएगी। पडरौना कोतवाली समेत जिले के विभिन्न थानों में जन्माष्टमी आयोजन की तैयारियां की जा रही हैं। पुलिस लाइन में भी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को लेकर व्यवस्थाएं की जा रही हैं। पुलिसकर्मी पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे। स्थानीय नागरिकों को भी आयोजन में शामिल किया जाएगा। इस बार जन्माष्टमी का आयोजन एक नई सोच के साथ होगा। एक ओर पुलिसकर्मी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की खुशियां मनाएंगे, वहीं दूसरी ओर पचरुखिया की घटना में शहीद हुए अपने साथियों को भी श्रद्धापूर्वक याद करेंगे।
साजिद अंसारी









