पडरौना डोल मेले में धार्मिक झांकियों की जगह आर्केस्ट्रा का बढ़ा दबदबा

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भक्ति और परंपरा के बीच फूहड़ प्रस्तुतियों पर उठे सवाल, आयोजकों और प्रशासन की भूमिका पर भी चर्चा

कुशीनगर। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तीसरे दिन पडरौना शहर में आयोजित पारंपरिक डोल मेला सोमवार की सुबह संपन्न हो गया। नगर के विभिन्न अखाड़ों की ओर से भगवान श्रीकृष्ण की डोल झांकियां निकाली गईं। श्रद्धालुओं ने जगह-जगह पूजा-अर्चना की और धार्मिक जुलूस में शामिल होकर आस्था प्रकट की। हालांकि, इस बार मेले में धार्मिक प्रस्तुतियों के साथ आर्केस्ट्रा कार्यक्रमों का बढ़ता प्रभाव भी चर्चा का विषय बना रहा।

रविवार की रात करीब साढ़े दस बजे नगर के छावनी, सुभाष चौक, बेलवा चुंगी, कसेरा टोली, तुरहा टोली, दरबार रोड और तिलक चौक समेत विभिन्न स्थानों से डोल व अखाड़ा दल नगर भ्रमण के लिए निकले। अखाड़ों के साथ ट्रैक्टर-ट्रॉली पर आर्केस्ट्रा भी लगाए गए थे। देर रात तक मुख्य मार्गों और मोहल्लों में जुलूस के साथ भीड़ चलती रही।

परंपरागत रूप से डोल मेला भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, धार्मिक झांकियों, भजन-कीर्तन और लोक संस्कृति से जुड़ा आयोजन माना जाता है। लेकिन इस बार कई स्थानों पर भक्ति गीतों की अपेक्षा फिल्मी और फूहड़ गीतों पर आधारित प्रस्तुतियां अधिक दिखाई दीं। आर्केस्ट्रा में शामिल नर्तकियों के कुछ नृत्य और प्रस्तुतियों को लेकर श्रद्धालुओं ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि धार्मिक जुलूस में मनोरंजन के नाम पर ऐसी प्रस्तुतियां नहीं होनी चाहिए, जो आयोजन की गरिमा के अनुरूप न हों।

धार्मिक आयोजन के स्वरूप पर उठे सवाल

डोल मेले में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की भी बड़ी संख्या में मौजूदगी रहती है। ऐसे में जुलूस के दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले कार्यक्रमों के स्वरूप को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। श्रद्धालुओं का कहना है कि धार्मिक आयोजनों में भजन, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक झांकियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी भी अपनी परंपराओं से जुड़ सके।

लोगों का यह भी कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में डोल मेले में धार्मिक झांकियों और पारंपरिक प्रस्तुतियों की जगह आर्केस्ट्रा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। इससे मेले के मूल स्वरूप को लेकर चिंता पैदा हो रही है। यदि समय रहते इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में धार्मिक आयोजन का स्वरूप बदल सकता है।

आयोजकों की जिम्मेदारी पर चर्चा

मेले में आर्केस्ट्रा कार्यक्रमों के दौरान आपत्तिजनक प्रस्तुतियों को लेकर आयोजन समितियों की भूमिका पर भी चर्चा होती रही। लोगों का कहना है कि धार्मिक जुलूस में शामिल कार्यक्रमों की निगरानी और उनके स्वरूप को लेकर आयोजकों को पहले से स्पष्ट व्यवस्था करनी चाहिए। साथ ही प्रशासन को अनुमति देते समय सुरक्षा के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादा का भी ध्यान रखना चाहिए।

इस संबंध में श्रद्धालुओं ने मांग की कि जिले में आयोजित होने वाले डोल मेलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। धार्मिक जुलूसों में अश्लील गीतों और आपत्तिजनक नृत्य प्रस्तुतियों पर प्रभावी रोक लगाई जाए तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

पुलिस और पीएसी की रही तैनाती

डोल मेले के दौरान पुलिस और पीएसी के जवान विभिन्न डोल व अखाड़ा दलों के साथ तैनात रहे। सुरक्षा व्यवस्था के बीच जुलूस नगर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरा। हालांकि, आर्केस्ट्रा कार्यक्रमों के स्वरूप को लेकर उठे सवालों के बीच लोगों ने यह भी कहा कि धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था के साथ कार्यक्रमों की निगरानी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

नपाध्यक्ष ने व्यवस्थाओं का लिया जायजा

डोल मेले के दौरान पडरौना नगर पालिका अध्यक्ष विनय जायसवाल ने विभिन्न डोल समितियों और अखाड़ा मंडलों के बीच पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने समितियों को नगर पालिका की ओर से आवश्यक सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि परंपरागत डोल मेले में किसी प्रकार की कमी नहीं होने दी जाएगी और नगर पालिका प्रशासन आयोजन समितियों के सहयोग के लिए तैयार है।

नगर पालिका की ओर से डोल झांकियों वाले प्रमुख मार्गों की विशेष साफ-सफाई, बिजली व्यवस्था और पानी के टैंकर की व्यवस्था की गई थी। धूल-मिट्टी से बचाव के लिए सड़कों पर पानी का छिड़काव भी कराया गया। इसके अलावा जलकल परिसर में श्रद्धालुओं के लिए अल्पाहार, जलपान और मेडिकल किट की व्यवस्था की गई थी।

नपाध्यक्ष ने मेले के सफल आयोजन के लिए आयोजन समितियों, नगर पालिका कर्मियों, पुलिस प्रशासन और आमजन को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर नपाध्यक्ष प्रतिनिधि मनीष जायसवाल समेत अन्य लोग मौजूद रहे।

अब जरूरत मेले की परंपरा और मर्यादा को बनाए रखने की है। धार्मिक आयोजन में मनोरंजन हो, लेकिन उसकी प्राथमिकता भक्ति, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द ही रहनी चाहिए।

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