पंजाब चुनाव से पहले सुखबीर बादल-मोदी की मुलाकात सियासत गरमाई

सुखबीर सिंह बादल की पीएम मोदी से मुलाकात

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पंजाब में अगले पांच महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। शुक्रवार को शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल दिल्ली पहुंचे और संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस मुलाकात ने पंजाब की सियासत में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या बीजेपी और अकाली दल एक बार फिर साथ आने वाले हैं?

मुलाकात के बाद सुखबीर बादल ने मीडिया को बताया कि चर्चा पंजाब की कानून-व्यवस्था और राज्य सरकार की योजनाओं में भ्रष्टाचार को लेकर हुई। बैठक का पूरा एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे गठबंधन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

कृषि कानूनों ने तोड़ी थी ढाई दशक पुरानी साझेदारी

गौरतलब है कि बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन पंजाब की राजनीति में करीब 25 सालों तक कायम रहा, जिसका दोनों दलों को चुनावी लाभ मिलता रहा। लेकिन 2020 में तीन कृषि कानूनों को लेकर छिड़े किसान आंदोलन ने इस रिश्ते को तोड़ दिया। ग्रामीण और किसान वोटबैंक अकाली दल की राजनीतिक रीढ़ रहा है, जिस वजह से पार्टी को एनडीए से अलग होना पड़ा। हालांकि बाद में केंद्र ने वे तीनों कानून वापस ले लिए, फिर भी दोनों दलों के बीच बनी दूरी पूरी तरह खत्म नहीं हुई और 2022 विधानसभा व 2024 लोकसभा चुनाव दोनों ने अलग-अलग लड़े।

दोनों दल क्यों तलाश रहे एक-दूसरे का साथ

गठबंधन टूटने के बाद से अकाली दल के भीतर बड़ा उथल-पुथल देखने को मिला है। पार्टी के कई कद्दावर नेता सुखबीर बादल का साथ छोड़ चुके हैं, जिससे अकाली दल अकेले दम पर आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए मजबूत विकल्प नहीं बन पा रही। वहीं बीजेपी भी पंजाब में एक मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी की तलाश में जुटी है। दूसरे दलों से बड़े चेहरे जोड़ने के बावजूद पार्टी अब तक अकेले सत्ता में आने लायक जमीन तैयार नहीं कर सकी है।

सीटों और वोट प्रतिशत का गणित

पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में बीजेपी परंपरागत रूप से सिर्फ 23 सीटों पर चुनाव लड़ती आई है। 2017 के गठबंधन चुनाव में पार्टी को केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी, जबकि 2022 में अकेले लड़ने पर लगभग सफाया हो गया। राज्य में शहरी वोटरों पर बीजेपी और ग्रामीण वोटरों पर अकाली दल की पकड़ रही है — यही समीकरण दोनों दलों को एक-दूसरे के करीब लाता रहा है। जनसंख्या के आंकड़े देखें तो पंजाब में करीब 38.49 फीसदी हिंदू और 31.94 फीसदी अनुसूचित जाति मतदाता हैं, और बीजेपी की नजर उन 45 सीटों पर है जहां हिंदू आबादी 60 फीसदी से ज्यादा है।

विश्लेषकों की राय: जमीनी तालमेल जरूरी

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर हिंदू-सिख वोटों के पुराने समीकरण को दोबारा जिंदा करना है, तो अकाली दल और बीजेपी को जमीनी स्तर पर एक साथ आना ही होगा। हालांकि अब तक दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई औपचारिक बयान नहीं आया है। सुखबीर बादल बार-बार यह कहते रहे हैं कि पार्टी को मजबूत करना उनकी पहली प्राथमिकता है, लेकिन दिल्ली में हुई इस मुलाकात ने साफ संकेत दे दिया है कि 2027 के चुनाव तक पंजाब की सियासत में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं

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