कुशीनगर। बालू परिवहन को लेकर तमकुहीराज क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने वाहनों की निगरानी और आईएसटीपी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 12 चक्का ट्रक यूपी53ईटी/1621 के नाम से कथित तौर पर 25 घनमीटर बालू का आईएसटीपी सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर वाहन की वास्तविक क्षमता और दस्तावेज में दर्ज बालू की मात्रा का आधार क्या है। आरोप है कि आईएसटीपी मूल रूप से किसी बड़े वाहन के लिए तैयार किया गया था और बाद में वाहन का नंबर बदलकर 12 चक्का ट्रक का नंबर दर्ज कर दिया गया, जबकि बालू की मात्रा में बदलाव नहीं किया गया।हालांकि, इस पूरे मामले में लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में इसकी वास्तविकता संबंधित रिकॉर्ड की तकनीकी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। लेकिन एक 12 चक्का वाहन के नाम पर 25 घनमीटर बालू दर्ज होने की जानकारी ने परिवहन व्यवस्था की निगरानी पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
वाहन बदला या दस्तावेज में हुई तकनीकी चूक?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आईएसटीपी में दर्ज वाहन और बालू की मात्रा का आपस में कितना तकनीकी सामंजस्य है। यदि किसी बड़े वाहन के लिए आईएसटीपी तैयार किया गया था और बाद में उसका नंबर बदलकर छोटे वाहन का नंबर दर्ज किया गया, तो यह गंभीर दस्तावेजी विसंगति का विषय बन जाता है। वहीं, यदि यह महज तकनीकी या मानवीय त्रुटि है तो संबंधित विभाग के मूल डिजिटल रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि आसानी से की जा सकती है। इसलिए पूरे मामले में आईएसटीपी का मूल रिकॉर्ड, वाहन का पंजीयन प्रमाणपत्र, वाहन की चक्का संख्या, अनुमन्य क्षमता, संबंधित खदान का डिस्पैच रजिस्टर और इलेक्ट्रॉनिक लॉग की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
चार घनमीटर के आईएसटीपी पर बड़े वाहनों का आरोप
तमकुहीराज क्षेत्र में इससे अलग एक और गंभीर आरोप चर्चा में है। आरोप है कि 14, 16, 18 और 22 चक्का जैसे बड़े वाहनों को छोटे वाहन के रूप में दर्शाकर महज चार घनमीटर का आईएसटीपी जारी कराया जा रहा है। यदि जांच में ऐसा कोई मामला सामने आता है तो यह केवल परिवहन नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी राजस्व और निगरानी व्यवस्था से भी जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। हालांकि इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय पिछले दो महीनों के आईएसटीपी रिकॉर्ड का वाहनवार ऑडिट कराना अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। वाहन नंबर, वाहन का प्रकार, आईएसटीपी में दर्ज मात्रा, खदान से निकलने का समय, गंतव्य और वाहन के आवागमन के रिकॉर्ड का मिलान करने पर कथित अनियमितता की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
टड़वा से बनकटा तक निगरानी व्यवस्था पर सवाल
तमकुही थाना क्षेत्र के टड़वा चौराहा, सरेया खुर्द पुल, समउर, रकबा और बनकटा क्षेत्र में बालू लदे वाहनों की आवाजाही को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ वाहन बिना वैध आईएसटीपी अथवा संदिग्ध दस्तावेजों के साथ स्थानीय स्तर पर कथित मैनेजमेंट के जरिए सीमा क्षेत्र से गुजरते हैं। इन आरोपों की पुष्टि के लिए पिकेटों पर तैनात पुलिसकर्मियों की ड्यूटी, वाहन जांच का विवरण, पकड़े गए और छोड़े गए वाहनों का रिकॉर्ड तथा संबंधित वाहनों के आईएसटीपी का मिलान किया जाना जरूरी है। यदि सड़क पर निगरानी और ऑनलाइन दस्तावेजों के रिकॉर्ड में अंतर मिलता है तो इससे व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
तरयासुजान में नंबर बदलने का मामला पहले भी आया, फिर दर्ज हुआ था मुकदमा
इसी बीच तरयासुजान थाना क्षेत्र में आईएसटीपी से संबंधित दस्तावेजों में वाहन नंबर के कथित इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई का मामला भी सामने आ चुका है। बताया गया कि बीआर28जीए/9448 वाहन को दूसरे ट्रक के नंबर के इस्तेमाल के आरोप में पकड़ा गया और इस संबंध में जालसाजी का मुकदमा दर्ज किया गया। ऐसे में तमकुहीराज में सामने आए कथित आईएसटीपी विसंगति के मामले को भी केवल तकनीकी गलती मानकर छोड़ने के बजाय रिकॉर्ड के स्तर पर जांच किए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। यदि दोनों मामलों की कार्यप्रणाली में कोई समानता मिलती है तो यह भी जांच का विषय होगा कि कहीं ये अलग-अलग घटनाएं हैं या बालू परिवहन में दस्तावेजों के दुरुपयोग का कोई व्यापक पैटर्न है।
कप्तान की सख्ती के बावजूद स्थानीय निगरानी पर सवाल
अवैध बालू परिवहन के खिलाफ पुलिस अधीक्षक केशव कुमार द्वारा कार्रवाई के निर्देश और सख्ती के बावजूद यदि संदिग्ध दस्तावेजों वाले वाहनों की आवाजाही की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो स्थानीय निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मामला सही पाए जाने पर केवल वाहन चालक या वाहन स्वामी तक कार्रवाई सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। आईएसटीपी किस स्तर से जारी हुआ, उसमें वाहन का विवरण किसने दर्ज किया, खदान से कितनी मात्रा में बालू डिस्पैच हुई और रास्ते में वाहन की निगरानी किस प्रकार हुई—इन सभी बिंदुओं की जिम्मेदारी तय करनी होगी।
डीएम-एसपी कराएं दो माह के आईएसटीपी का क्रॉस-वेरिफिकेशन
पूरे मामले की निष्पक्षता से जांच के लिए पिछले दो महीनों में जारी सभी आईएसटीपी का वाहनवार क्रॉस-वेरिफिकेशन कराया जाना सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। संबंधित खदानों से कुशीनगर, गोरखपुर और महराजगंज की ओर भेजे गए वाहनों की सूची तैयार कर उनके आईएसटीपी से मिलान किया जाए। इसके साथ ही प्रत्येक वाहन की आरसी, चक्का संख्या, अनुमन्य भार/क्षमता, आईएसटीपी में दर्ज मात्रा, खदान के डिस्पैच रिकॉर्ड, जारी होने का समय और गंतव्य का भी मिलान कराया जाए। डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने की स्थिति में आईएसटीपी बनाने और उसमें संशोधन से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक लॉग की जांच भी अहम होगी।
रिकॉर्ड की जांच से खुलेगा असली राज
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 12 चक्का ट्रक यूपी53ईटी/1621 के नाम पर 25 घनमीटर बालू का आईएसटीपी कैसे दर्ज हुआ? क्या यह तकनीकी त्रुटि थी, वाहन बदलने के बाद नंबर संशोधित किया गया या फिर दस्तावेजों का किसी अन्य तरीके से इस्तेमाल हुआ? यदि जांच में रिकॉर्ड पूरी तरह सही मिलता है तो सामने आए आरोप स्वत: कमजोर पड़ जाएंगे। लेकिन यदि वाहन का नंबर, वाहन का प्रकार और आईएसटीपी में दर्ज मात्रा के बीच लगातार विसंगतियां मिलती हैं, तो जांच को केवल एक वाहन तक सीमित रखने के बजाय पूरी प्रक्रिया की पड़ताल करनी होगी। फिलहाल आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन 12 चक्का ट्रक के नाम पर 25 घनमीटर बालू का आईएसटीपी सामने आने से तमकुहीराज की बालू परिवहन व्यवस्था पर कई सवाल जरूर खड़े हुए हैं। अब इन सवालों का जवाब सड़क पर वाहनों को देखकर नहीं, बल्कि आईएसटीपी, आरसी, खदान के डिस्पैच रिकॉर्ड और डिजिटल लॉग के वैज्ञानिक मिलान से ही सामने आ सकता है।
साजिद अंसारी पड़रौना









