ऑपरेशन सिंदूर को बीते करीब सवा साल हो चुका है, लेकिन उस दौरान हुई हवाई जंग के कई राज़ अब सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान एयरफोर्स के रिटायर्ड एयर कमोडोर खालिद चिश्ती के हालिया बयान ने इस पूरे मामले को नया आयाम दे दिया है। उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि पाकिस्तान ने अपनी पूरी F-16 फ्लीट को उस दौरान उड़ान भरने ही नहीं दी — वजह थी भारत के राफेल जेट्स में लगी मेटियोर मिसाइल का खौफ।
क्यों मैदान में नहीं उतरे F-16 जेट्स
चिश्ती के मुताबिक, पाकिस्तानी पायलटों को अच्छी तरह पता था कि उनके F-16 पर लगी AMRAAM मिसाइल की रेंज सिर्फ 70-100 किलोमीटर तक सीमित है, जबकि राफेल की मेटियोर मिसाइल 120 से 200 किलोमीटर दूर से ही निशाना साध सकती है। इस बड़े फासले के चलते पाकिस्तानी पायलटों को डर था कि जवाबी कार्रवाई का मौका मिलने से पहले ही वे मिसाइल की जद में आ जाएंगे।
इसकी तकनीकी वजह भी दिलचस्प है। मेटियोर मिसाइल में रैमजेट इंजन लगा है, जो सामान्य रॉकेट मोटर वाली मिसाइलों के उलट पूरी उड़ान के दौरान ऊर्जा बनाए रखता है। इस वजह से इसका ‘नो एस्केप जोन’ — वह दायरा जहां टारगेट बच ही नहीं सकता — AMRAAM के मुकाबले करीब तीन गुना बड़ा, यानी 60 किलोमीटर से भी ज्यादा है। नतीजा यह हुआ कि राफेल पायलट सुरक्षित दूरी से ही दुश्मन को निशाना बना सकते थे, जबकि पाकिस्तानी F-16 आगे बढ़ते ही खतरे में आ जाते।
एयरबेस पर भी लगी बड़ी चोट
अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू हुए इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने राफेल, सुखोई-30MKI जैसे प्लेटफॉर्म से लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक हमले किए। जैकोबाबाद समेत कई एयरबेस पर F-16 के हैंगर क्षतिग्रस्त हुए। साथ ही एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तानी एयरस्पेस को लगभग बंद कर दिया, जिससे उनके विमानों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।
आगे की राह: क्या चीनी हथियार भर पाएंगे कमी
पाकिस्तान अब चीन से मिले जे-10सीई और पीएल-15 मिसाइलों के सहारे इस तकनीकी फासले को पाटने की कोशिश में लगा है। पीएल-15 का एक्सपोर्ट वर्जन करीब 145 किलोमीटर तक मार कर सकता है, जो मेटियोर के आसपास है। लेकिन जानकारों की मानें तो सिर्फ रेंज मायने नहीं रखती — असली फर्क रैमजेट टेक्नोलॉजी और नो एस्केप जोन में परफॉर्मेंस से पड़ता है, जहां मेटियोर अब भी आगे है। भारत की तरफ से भी अस्त्र मार्क-2 जैसी स्वदेशी मिसाइलों पर काम जारी है और मेटियोर का स्टॉक भी बढ़ाया जा रहा है।
खालिद चिश्ती का यह बयान सिर्फ एक कबूलनामा नहीं, बल्कि आधुनिक हवाई युद्ध की उस बदलती तस्वीर को भी दिखाता है जहां अब पायलट की स्किल से ज्यादा मिसाइल की रेंज और टेक्नोलॉजी फैसला करती है। और फिलहाल यह पलड़ा साफ तौर पर भारत की तरफ झुका हुआ नजर आता है।









