ग्लेशियर टूटने से बाढ़ तक… तिब्बत आपदा पर चीन की चुप्पी को लेकर उठे बड़े सवाल

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तिब्बत और नेपाल के कई गांवों को तबाह करने वाली भीषण बाढ़ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रकृति की मार किसी की राजनीति का इंतजार नहीं करती। लांगटांग लिरुंग पर्वत से टूटे विशाल ग्लेशियर ने जो तबाही मचाई, उसके बाद अब तिब्बत के भीतर चीनी प्रशासन की चुप्पी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

दलाई लामा के भतीजे का सीधा आरोप

दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने यूरोपियन टाइम्स में लिखे अपने लेख में साफ आरोप लगाया है कि जब लांगटांग लिरुंग पर्वत से ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर दो किलोमीटर से ज्यादा नीचे गिरा और इससे 5.2 तीव्रता के भूकंप जितनी ऊर्जा निकली, तब नेपाल-तिब्बत सीमा पर बसे गांवों में तबाही मच गई। लेकिन तिब्बत के भीतर यह पूरी त्रासदी सिर्फ फुसफुसाहटों तक सिमटी रह गई। थोंडुप के मुताबिक बीजिंग की सेंसरशिप व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया कि इस आपदा पर कोई आधिकारिक बुलेटिन, स्थानीय रिपोर्ट या सार्वजनिक स्वीकारोक्ति सामने ही न आए। उनके शब्दों में यह चुप्पी संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति है।

‘स्थिरता’ की छवि बनाम असल संकट

थोंडुप का कहना है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी तिब्बत को एक नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की तरह नहीं, बल्कि अपनी ‘स्थिरता’ दिखाने के प्रचार मंच की तरह देखती है। ऐसी आपदाएं इस छवि को नुकसान पहुंचाती हैं। इसके अलावा, अगर जलवायु परिवर्तन के दबाव में ग्लेशियर टूटने की बात खुलकर स्वीकार की जाए, तो इससे हिमालय क्षेत्र में चीन की बड़ी जलविद्युत और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की खामियां भी उजागर हो सकती हैं।

सीमा पार तक फैला असर, फिर भी चुप्पी

नेपाल तक पहुंची यह अचानक बाढ़ साफ दिखाती है कि ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा किसी सीमा में बंधा नहीं रहता। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, कूटनीतिक असहजता से बचने के लिए आधिकारिक चुप्पी साधी जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि तिब्बती लोगों की आवाज दब जाती है, स्थानीय चश्मदीदों को बोलने का मौका नहीं मिलता, और सीमा क्षेत्रों से आने वाली जानकारियों को ‘अफवाह’ करार देकर जल्द ही हटा दिया जाता है।

“चुप्पी तटस्थ नहीं, घातक है”

यूरोपियन टाइम्स की रिपोर्ट में एक बेहद तीखी टिप्पणी की गई है — नेपाल में परिवार अपनों की मौत का शोक मना रहे हैं, जबकि सीमा के दूसरी ओर तिब्बती लोगों को अपने लापता रिश्तेदारों या गांवों की हालत तक की जानकारी नहीं मिल पा रही। आधिकारिक सूचना के अभाव में न राहत कार्यों का तालमेल बन पा रहा है, न नीचे के इलाकों को चेतावनी दी जा रही है, और न ही किसी की जवाबदेही तय हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक यहां चुप्पी तटस्थ नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जानलेवा साबित हो रही है।

पहली बार नहीं है ऐसा आरोप

रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया है कि बीजिंग पर तिब्बत में आई आपदाओं की खबर दबाने का आरोप पहली बार नहीं लगा है। इससे पहले भी भूकंप, भूस्खलन और बांध से जुड़ी दुर्घटनाओं की खबरों को आधिकारिक माध्यमों में या तो बहुत कम तवज्जो दी गई या पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

नदियां सेंसर नहीं हो सकतीं

रिपोर्ट में एक बेहद मार्मिक बात कही गई है — तिब्बत से निकलने वाली नदियां नेपाल, भारत और बांग्लादेश तक जाती हैं, और इन्हें सेंसर नहीं किया जा सकता। ये नदियां अपने साथ सच को भी नीचे तक लेकर जाती हैं, भले ही ऊपर से आवाज दबाई जाए।

हिमालय में बढ़ता खतरा

आखिर में रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि हिमालय क्षेत्र वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है। इस वजह से ग्लेशियरों के पिघलने, अस्थिर होने और टूटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। हर ऐसी घटना अपने साथ भूगर्भीय और भू-राजनीतिक, दोनों स्तर के गंभीर परिणाम लेकर आती है — और तिब्बत जैसे संवेदनशील इलाके में पारदर्शिता की कमी इस खतरे को और बढ़ा देती है।

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