28 अगस्त को देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाएगा। हर साल सावन की पूर्णिमा पर आने वाला यह पर्व सदियों पुराना है, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि राखी बांधने की यह परंपरा असल में शुरू कहां से हुई थी। जवाब मिलता है वेदों और पुराणों की उन कथाओं में, जो सदियों से चली आ रही हैं।
अथर्ववेद में मिलता है सबसे पुराना उल्लेख
रक्षा सूत्र बांधने की रीत वैदिक युग से चली आ रही है। उस दौर में ऋषि अपने शिष्यों और यजमानों की रक्षा के लिए कलाई पर रक्षा सूत्र, यानी कलावा बांधते थे और साथ में वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी करते थे। अथर्ववेद में एक ऐसा ही मंत्र मौजूद है, जो कहता है कि जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानव राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से अब यह बंधन बांधा जा रहा है। यही मंत्र आज भी रक्षा सूत्र बांधते वक्त पढ़ा जाता है।
राजा बलि और वामन अवतार की कथा
राजा बलि की यह कथा स्कंद पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत में विस्तार से मिलती है। कथा के अनुसार जब असुर राज बलि ने देवताओं को हराकर देवलोक पर कब्जा कर लिया, तो भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनसे तीन पग धरती मांगी। अहंकार में डूबे बलि ने बिना सोचे-समझे हामी भर दी, और भगवान ने विशाल रूप धरकर दो पगों में ही पूरी सृष्टि नाप ली। तीसरा पग रखने के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया, जिससे वे रसातल पहुंच गए। भगवान विष्णु ने उन्हें अजर-अमर रहने का वरदान दिया और उनके साथ रहने का वचन भी दे दिया।
इसके बाद देवी लक्ष्मी की चिंता बढ़ गई क्योंकि विष्णु जी बलि के पास ही रहने लगे थे। नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया और वचन लेकर विष्णु जी को वापस अपने साथ ले आईं। यहीं से राखी के ‘भाई बनाने’ वाले रूप की शुरुआत मानी जाती है।
इंद्र-इंद्राणी और महाभारत का प्रसंग
भविष्य पुराण में एक और कथा मिलती है, जिसमें देवराज इंद्र अपनी पत्नी शची से रक्षा सूत्र बंधवाते हैं। गुरु बृहस्पति के निर्देश पर, देवासुर संग्राम में हार की कगार पर पहुंचे इंद्र ने श्रावण पूर्णिमा के दिन यह मंत्रबद्ध धागा बंधवाया था, जिसके बाद वे युद्ध जीत गए। इसी परंपरा से आगे चलकर पत्नियों द्वारा पति की कलाई पर राखी बांधने की रीत शुरू हुई, हालांकि लोक परंपरा में यह भाई-बहन के रिश्ते तक सिमट गई। महाभारत में भी द्रौपदी द्वारा कृष्ण को राखी बांधने का जिक्र मिलता है, जिसके बदले कृष्ण हमेशा द्रौपदी के हर संकट में उनकी रक्षा करते रहे।
इतिहास की वे राखियां जो बदल गईं कहानियां
राखी सिर्फ पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं रही। इतिहास में भी इसके कई किस्से मिलते हैं। मेवाड़ की रानी कर्णावती द्वारा मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगने की लोककथा प्रसिद्ध है, हालांकि तत्कालीन फारसी दस्तावेजों में इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसी तरह एक और लोककथा में सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने राजा पोरस को राखी बांधकर अपने पति की जान बख्शने का अनुरोध किया था। महाराजा रणजीत सिंह की पत्नी जिंदां कौर द्वारा नेपाल के राजा को राखी भेजे जाने का प्रसंग भी मिलता है।
हर धर्म और परंपरा से जुड़ा त्योहार
रक्षाबंधन सिर्फ हिंदू परंपरा तक सीमित नहीं। जैन परंपरा में मुनि विष्णुकुमार द्वारा 700 जैन मुनियों की रक्षा करने की कथा प्रचलित है। सिख परंपरा में भी खालसा सेना अपनी प्रजा की रक्षा के लिए राखी की रस्म निभाती थी। बौद्ध परंपरा में इसे ‘रक्खा सूत’ कहा जाता है, जो भगवान बुद्ध के उपदेशों का पालन करने की शपथ का प्रतीक है। आदिवासी समुदायों में पेड़ों को भाई मानकर धागा बांधने की परंपरा आज भी कई जगह जीवित है।
बंगाल का रक्षाबंधन और आजादी की लड़ाई
1905 में बंगाल विभाजन के दौरान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षाबंधन को भाईचारे और एकता के प्रतीक के तौर पर मनाने का आह्वान किया था। उनकी कविता के जरिए यह त्योहार बंगाल में स्वतंत्रता संग्राम की भावना से जुड़ गया।
आज का रक्षाबंधन
समय के साथ राखी का स्वरूप भी बदल गया है। आज यह त्योहार भारत ही नहीं, यूरोप और अमेरिका में बसे भारतीय समुदायों में भी उतनी ही धूमधाम से मनाया जाता है। राखियों का वैश्विक कारोबार करीब 30 हजार करोड़ रुपये का आंका गया है। कोरियर से राखी भेजना, वीडियो कॉल पर राखी बंधवाना और मिठाई की जगह ड्राई फ्रूट्स देना — यह त्योहार अब बदलते वक्त के साथ नए रूप में ढल चुका है, लेकिन इसकी जड़ें आज भी उन्हीं वैदिक और पौराणिक कथाओं में मौजूद हैं।









