*राइपेनिंग चैम्बर ने जितेंद्र कुशवाहा की बदली राह, खेती के साथ केले के कारोबार से बढ़ी आय*

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 _पीएमएफएमई योजना से मिला बैंक ऋण और 35 प्रतिशत अनुदान, आसपास के किसानों को भी स्थानीय बाजार की सुविधा_

कुशीनगर। पारंपरिक खेती के साथ कृषि आधारित व्यवसाय को अपनाकर किसान अपनी आय बढ़ाने के साथ अन्य किसानों के लिए भी बाजार की व्यवस्था तैयार कर सकते हैं। विकासखंड कसया के ग्राम कुड़वा उर्फ दिलीपनगर निवासी किसान जितेंद्र कुशवाहा की कहानी इसका उदाहरण है। उन्होंने उद्यान विभाग के सहयोग से प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन (पीएमएफएमई) योजना का लाभ लेकर केला पकाने के लिए राइपेनिंग चैम्बर स्थापित किया है।

जितेंद्र कुशवाहा पहले पारंपरिक रूप से गन्ना, गेहूं और धान की खेती करते थे। इन फसलों से लागत और मेहनत के बाद उन्हें करीब 26 से 32 हजार रुपये तक का अनुमानित लाभ प्राप्त होता था। आय बढ़ाने के उद्देश्य से वह कृषि से जुड़े किसी ऐसे व्यवसाय की तलाश में थे, जिससे स्थानीय किसानों को भी लाभ मिल सके। इसी दौरान उन्हें उद्यान विभाग के माध्यम से पीएमएफएमई योजना की जानकारी मिली।

विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों के मार्गदर्शन में उन्होंने केले के व्यवसाय से जुड़ने और राइपेनिंग चैम्बर स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके लिए 5.98 लाख रुपये का बैंक ऋण स्वीकृत हुआ। योजना के तहत उन्हें 35 प्रतिशत सब्सिडी के रूप में 2,32,750 रुपये की धनराशि प्राप्त हुई। राइपेनिंग चैम्बर स्थापित होने के बाद जितेंद्र ने आसपास के किसानों के लिए केले की बिक्री की स्थानीय व्यवस्था भी विकसित की। क्षेत्र के किसान अपने खेतों से उत्पादित केले उनके पास लेकर आते हैं।

जितेंद्र किसानों से केले की खरीद करते हैं और उन्हें राइपेनिंग चैम्बर में नियंत्रित वातावरण में पकाने के बाद बाजार में बिक्री के लिए भेजते हैं। इस व्यवस्था से स्थानीय किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बाजार उपलब्ध हो रहा है। वहीं, केले को आवश्यकता और बाजार की मांग के अनुसार पकाकर बेचने से उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने और बेहतर विपणन में मदद मिल रही है। इससे किसानों की दूर के बाजारों पर निर्भरता भी कम हो रही है।

जितेंद्र कुशवाहा बताते हैं कि पहले उनकी आय मुख्य रूप से पारंपरिक फसलों पर निर्भर थी, लेकिन पीएमएफएमई योजना और उद्यान विभाग के सहयोग से राइपेनिंग चैम्बर स्थापित करने का अवसर मिला। अब केले की खरीद, पकाने और विपणन के माध्यम से उन्हें आय का नया स्रोत मिला है। साथ ही आसपास के किसानों को भी अपनी उपज बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधा मिल रही है।

जितेंद्र की पहल कृषि उपज के प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है। उनकी सफलता यह दर्शाती है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर किसान खेती के साथ कृषि आधारित उद्यम शुरू कर सकते हैं और अपनी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार कर सकते हैं। पीएमएफएमई योजना के तहत स्थापित राइपेनिंग चैम्बर उनके लिए स्वरोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का माध्यम बना है।

 

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