जेन-ज़ी’ (Gen-Z) विरोध प्रदर्शन: 1,778 आरोपियों में से 300 के खिलाफ मामले वापस लिए जा सकते

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काठमांडो (नेपाल)। ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर लगे आपराधिक आरोपों को हटाने की संभावना पर विचार करने के लिए बनाई गई एक समिति ने सलाह दी है कि ‘भाद्र 24′ को हुई तोड़-फोड़ में कथित तौर पर शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किए गए ज़्यादातर लोगों के खिलाफ़ मामले वापस नहीं लिए जा सकते। ज़्यादा से ज़्यादा आरोपियों के खिलाफ़ आरोप वापस लेने की अनुमति देने वाली रिपोर्ट तैयार करने के दबाव के बावजूद, समिति ने सिफ़ारिश की है कि केवल 300 लोगों के खिलाफ़ मामले वापस लिए जाएं।

पूर्व हाई कोर्ट जज बाबूराम रेग्मी की अध्यक्षता वाली एक समिति ने राय दी है कि ‘जेन-जेड’ आंदोलन से जुड़े 445 मामलों में शामिल 1,778 आरोपियों में से 300 के खिलाफ मामले वापस लिए जा सकते हैं, लेकिन बाकी आरोपियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक अपराधों में शामिल होने के कारण कानूनी प्रावधान मामले वापस लेने की इजाज़त नहीं देते।

समिति ने 15 अश्विन को गृह मंत्री सुधन गुरुंग को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति द्वारा जांचे गए मामलों में से 53 में अदालतें पहले ही फैसला सुना चुकी हैं। समिति के सूत्रों के अनुसार, गृह मंत्री गुरुंग ने खुद निर्देश दिया था कि ‘जेन-Z‘ विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर बिना सोचे-समझे दर्ज किए गए मामलों को वापस लेने की सिफारिश करते हुए एक रिपोर्ट सौंपी जाए। सिवाय उन मामलों के जिनमें हत्या का आरोप हो—क्योंकि ये आरोप बदले की भावना से लगाए गए थे।

समिति के एक सदस्य ने बताया, “सरकार ज़्यादातर मामलों को वापस लेने की सिफारिश चाहती थी, लेकिन ऐसी राय देना कानूनी रूप से संभव नहीं था। गृह मंत्री गुरुंग ने कहा कि विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की वजह से जिन लोगों पर केस दर्ज किए गए थे—जिन्हें उन्होंने बदले की कार्रवाई बताया—उन्हें वापस लेने की तैयारी चल रही है। उन्होंने बताया कि भाद्र 23, 2082 की घटनाओं में शामिल लोग कोर्ट के आदेशों के कारण जेल से बाहर हैं, जबकि भाद्र 24 की घटनाओं में शामिल लोग अभी भी जेल में बंद हैं। उन्होंने कहा, “उनके परिवार सड़कों पर उतरकर न्याय की मांग कर रहे हैं; हम आखिरकार सभी ज़रूरी प्रक्रियाओं को पूरा करके इस मामले को सुलझाने की दिशा में काम कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि कमेटी की रिपोर्ट जमा होने के बाद उनकी रिहाई की सिफारिश की जाएगी।

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस जांच के बाद सरकारी वकील के ज़रिए दायर कुछ मामलों में, लोगों को सिर्फ़ सड़कों पर उतरने, प्रदर्शनों में शामिल होने या विरोध-प्रदर्शन के दौरान नारे लगाने की वजह से अपराधी ठहराया गया; इसलिए समिति ऐसे आरोपियों के ख़िलाफ़ मामले वापस लेने की सिफारिश करती है। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, समिति ने संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट और सिंहदरबार जैसी अहम इमारतों में तोड़-फोड़ में शामिल लोगों के खिलाफ़ मामले वापस न लेने की सलाह दी है।

अधिकारी ने कहा, “कानून के तहत निजी संपत्ति की लूट-पाट से जुड़े मामलों में संबंधित मालिकों को मुआवज़ा देना ज़रूरी है, और यह देखा गया है कि सरकार के लिए ऐसा मुआवज़ा देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों को वापस लेने के लिए सरकारी पहल की ज़रूरत है।

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