कुशीनगर के कप्तानगंज से सामने आई ये खबर सिर्फ एक बंद पड़ी डिस्टलरी की कहानी नहीं है, बल्कि करीब 40 कर्मचारियों और उनके परिवारों के उस दर्द की कहानी है, जो लगभग दो दशक से अपने हक के पैसे का इंतजार कर रहे हैं।
कभी जिस परिसर में करीब 110 कर्मचारियों की रोजी-रोटी चलती थी, आज वही डिस्टलरी जर्जर होकर झाड़ियों में तब्दील हो चुकी है। लेकिन कर्मचारियों का दावा है कि उनका वेतन, ग्रेच्युटी, एलआईसी फंड और दूसरे बकाये अब तक नहीं मिले हैं।
कुशीनगर के कप्तानगंज की यह तस्वीर उस औद्योगिक इकाई की है, जहां कभी रोजगार और कारोबार की चहल-पहल हुआ करती थी।
करीब वर्ष 2002 में सौम्या ऑर्गेनिक लिमिटेड ने डिस्टलरी का संचालन शुरू किया था। उस समय यहां करीब 110 कर्मचारी काम करते थे।
लेकिन कंपनी की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद जुलाई 2008 में डिस्टलरी पूरी तरह बंद हो गई।
डिस्टलरी बंद हुई तो कर्मचारियों की नौकरी गई, लेकिन उनका बकाया भी वहीं अटक गया।
कर्मचारियों के मुताबिक करीब 40 ऐसे कर्मचारी हैं, जिनका वेतन, ग्रेच्युटी, वेतन से काटी गई एलआईसी की रकम और दूसरे देयक आज भी लंबित हैं।
सबसे दर्दनाक बात यह है कि इन कर्मचारियों में कई लोग अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि कुछ कर्मचारियों की मौत भी हो चुकी है।
ऐसे में अब उनके परिवार अपने उस हक के पैसे का इंतजार कर रहे हैं, जिसके लिए करीब दो दशक गुजर चुके हैं।
कर्मचारी राधाकृष्ण यादव के मुताबिक बकाया भुगतान का मामला उप श्रमायुक्त, गोरखपुर के सामने भी उठाया गया था।
जिला प्रशासन के निर्देश पर कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच भुगतान को लेकर बातचीत हुई।
प्रबंधन की ओर से भुगतान का लिखित भरोसा भी दिया गया, लेकिन बाद में मामला कोर्ट पहुंच गया और भुगतान की प्रक्रिया दोबारा रुक गई।
यानी भरोसा मिला, उम्मीद जगी… लेकिन कर्मचारियों के हाथ आज भी खाली हैं।
कर्मचारी गणेश गिरी का कहना है कि ज्यादातर कर्मचारियों का पूरा बकाया अभी बाकी है।
करीब दो दशक से भुगतान का इंतजार कर रहे इन परिवारों के सामने अब आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

उधर, कभी रोजगार का बड़ा केंद्र रहा यह परिसर आज खुद बदहाली की कहानी बयां कर रहा है।
जर्जर भवन, खराब मशीनरी और परिसर में उगी झाड़ियां इस बात की गवाही दे रही हैं कि कभी यहां औद्योगिक गतिविधियां होती थीं।
स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि डिस्टलरी बंद होने का असर केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा।
इस औद्योगिक इकाई के बंद होने से आसपास की आर्थिक गतिविधियां और स्थानीय कारोबार भी प्रभावित हुए।
अब कर्मचारियों की मांग साफ है…
जिला प्रशासन और शासन इस मामले में हस्तक्षेप करे और लंबे समय से लंबित वेतन, ग्रेच्युटी, एलआईसी फंड समेत सभी बकायों का भुगतान सुनिश्चित कराया जाए।
कर्मचारियों का कहना है कि करीब दो दशक का इंतजार काफी लंबा हो चुका है।
डीएम ने कहा है कि मामला उनके संज्ञान में है और कर्मचारियों के प्रतिनिधि लिखित रूप में अपनी समस्या दें, जिसके समाधान के लिए पूरा प्रयास किया जाएगा।
अब देखना होगा कि प्रशासन की पहल से वर्षों से अटके इन कर्मचारियों के बकाये का रास्ता कब साफ होता है…
क्योंकि सवाल सिर्फ पैसों का नहीं है…
सवाल उन परिवारों के हक का है, जो करीब 18 साल से अपने मेहनत की कमाई का इंतजार कर रहे हैं।









